गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के शिशु रोग विभाग के निलंबित डॉक्टर कफील खान को दो साल बाद विभागीय जांच समिति ने क्लीनचिट दे दी है। डॉ कफ़ील पर आरोप था कि हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों के लिए वह ज़िम्मेदार हैं। इन्हीं आरोपों की बुनियाद पर उन्हें 9 महीने जेल में रहना पड़ा था।
विभागीय जांच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल में बच्चों की मौत में वह जिम्मेदार नहीं हैं और उन्होंने 10 और 11 अगस्त की रात को अस्पताल में बच्चों की जान बचाने के लिए तमाम प्रयास किए थे। जांच की रिपोर्ट गुरुवार को बीआरडी अधिकारियों ने कफील को दी। हालांकि
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर साफ़ तौर पर उन्हें सरकार और प्रशासन द्वारा फंसाए जाने की बात कही जा रही है। पत्रकार रोहिणी सिंह का कहना है कि डॉ कफ़ील को इस मामले में सिर्फ उनके मुस्लिम नाम की वजह से फंसाया गया।
रोहिणी सिंह ने ट्विटर के ज़रिए कहा, “डॉ कफील कभी दोषी नहीं थे। यह पहले दिन से ही स्पष्ट था। उनका एकमात्र गुनाह उनका नाम था। ये कारण उन्हें मिले अपमानजनक उत्पीड़न के लिए काफ़ी था”।
Rohini Singh
✔
@rohini_sgh
Dr Kafeel was never guilty. That was evident from the first day itself. His only crime was his name. That was reason enough for the outrageous levels of harassment meted out to him.
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6:31 AM - Sep 27, 2019
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क्या है पूरा मामला?
10 अगस्त, 2017 की रात जब डॉ. कफील ड्यूटी पर थे, तब अचानक ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म होते ही आईसीयू विभाग में भर्ती कई नवजात बच्चों ने दम तोड़ दिया था। उस वक्त डॉ. कफील बच्चों को बचाने के लिए अस्पताल के बाहर से ऑक्सीजन सिलिंडर लाए थे। घटना के बाद शुरुआत में तो डॉ. कफील मीडिया में हीरो बनकर उभरे। लेकिन थोड़े ही दिन बाद जब उन्होंने सरकार की लापरवाही पर सवाल खड़े करना शुरु किया तो 22 अगस्त को उन्हें लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित कर दिया गया और उनके खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी गई।
इसके बाद 2 सितंबर 2017 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जिसके बाद उन्होंने कोर्ट से ज़मानत की अपील की और 9 महीने बाद 25 अप्रैल 2018 को कफील को ज़मानत मिल गई। ज़मानत के बाद कफील ने हाईकोर्ट का रुख़ किया, जहां मार्च 2019 में कोर्ट ने विभागीय जांच 90 दिनों में पूरा करने का आदेश दिया। अब दो साल बाद उन्हें मामले में निर्दोष पाया गया है।
विभागीय जांच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल में बच्चों की मौत में वह जिम्मेदार नहीं हैं और उन्होंने 10 और 11 अगस्त की रात को अस्पताल में बच्चों की जान बचाने के लिए तमाम प्रयास किए थे। जांच की रिपोर्ट गुरुवार को बीआरडी अधिकारियों ने कफील को दी। हालांकि
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर साफ़ तौर पर उन्हें सरकार और प्रशासन द्वारा फंसाए जाने की बात कही जा रही है। पत्रकार रोहिणी सिंह का कहना है कि डॉ कफ़ील को इस मामले में सिर्फ उनके मुस्लिम नाम की वजह से फंसाया गया।
रोहिणी सिंह ने ट्विटर के ज़रिए कहा, “डॉ कफील कभी दोषी नहीं थे। यह पहले दिन से ही स्पष्ट था। उनका एकमात्र गुनाह उनका नाम था। ये कारण उन्हें मिले अपमानजनक उत्पीड़न के लिए काफ़ी था”।
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क्या है पूरा मामला?
10 अगस्त, 2017 की रात जब डॉ. कफील ड्यूटी पर थे, तब अचानक ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म होते ही आईसीयू विभाग में भर्ती कई नवजात बच्चों ने दम तोड़ दिया था। उस वक्त डॉ. कफील बच्चों को बचाने के लिए अस्पताल के बाहर से ऑक्सीजन सिलिंडर लाए थे। घटना के बाद शुरुआत में तो डॉ. कफील मीडिया में हीरो बनकर उभरे। लेकिन थोड़े ही दिन बाद जब उन्होंने सरकार की लापरवाही पर सवाल खड़े करना शुरु किया तो 22 अगस्त को उन्हें लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित कर दिया गया और उनके खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी गई।
इसके बाद 2 सितंबर 2017 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जिसके बाद उन्होंने कोर्ट से ज़मानत की अपील की और 9 महीने बाद 25 अप्रैल 2018 को कफील को ज़मानत मिल गई। ज़मानत के बाद कफील ने हाईकोर्ट का रुख़ किया, जहां मार्च 2019 में कोर्ट ने विभागीय जांच 90 दिनों में पूरा करने का आदेश दिया। अब दो साल बाद उन्हें मामले में निर्दोष पाया गया है।
गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के शिशु रोग विभाग के निलंबित डॉक्टर कफील खान को दो साल बाद विभागीय जांच समिति ने क्लीनचिट दे दी है। डॉ कफ़ील पर आरोप था कि हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों के लिए वह ज़िम्मेदार हैं। इन्हीं आरोपों की बुनियाद पर उन्हें 9 महीने जेल में रहना पड़ा था।
विभागीय जांच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल में बच्चों की मौत में वह जिम्मेदार नहीं हैं और उन्होंने 10 और 11 अगस्त की रात को अस्पताल में बच्चों की जान बचाने के लिए तमाम प्रयास किए थे। जांच की रिपोर्ट गुरुवार को बीआरडी अधिकारियों ने कफील को दी। हालांकि
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर साफ़ तौर पर उन्हें सरकार और प्रशासन द्वारा फंसाए जाने की बात कही जा रही है। पत्रकार रोहिणी सिंह का कहना है कि डॉ कफ़ील को इस मामले में सिर्फ उनके मुस्लिम नाम की वजह से फंसाया गया।
रोहिणी सिंह ने ट्विटर के ज़रिए कहा, “डॉ कफील कभी दोषी नहीं थे। यह पहले दिन से ही स्पष्ट था। उनका एकमात्र गुनाह उनका नाम था। ये कारण उन्हें मिले अपमानजनक उत्पीड़न के लिए काफ़ी था”।
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10 अगस्त, 2017 की रात जब डॉ. कफील ड्यूटी पर थे, तब अचानक ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म होते ही आईसीयू विभाग में भर्ती कई नवजात बच्चों ने दम तोड़ दिया था। उस वक्त डॉ. कफील बच्चों को बचाने के लिए अस्पताल के बाहर से ऑक्सीजन सिलिंडर लाए थे। घटना के बाद शुरुआत में तो डॉ. कफील मीडिया में हीरो बनकर उभरे। लेकिन थोड़े ही दिन बाद जब उन्होंने सरकार की लापरवाही पर सवाल खड़े करना शुरु किया तो 22 अगस्त को उन्हें लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित कर दिया गया और उनके खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी गई।
इसके बाद 2 सितंबर 2017 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जिसके बाद उन्होंने कोर्ट से ज़मानत की अपील की और 9 महीने बाद 25 अप्रैल 2018 को कफील को ज़मानत मिल गई। ज़मानत के बाद कफील ने हाईकोर्ट का रुख़ किया, जहां मार्च 2019 में कोर्ट ने विभागीय जांच 90 दिनों में पूरा करने का आदेश दिया। अब दो साल बाद उन्हें मामले में निर्दोष पाया गया है।
विभागीय जांच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल में बच्चों की मौत में वह जिम्मेदार नहीं हैं और उन्होंने 10 और 11 अगस्त की रात को अस्पताल में बच्चों की जान बचाने के लिए तमाम प्रयास किए थे। जांच की रिपोर्ट गुरुवार को बीआरडी अधिकारियों ने कफील को दी। हालांकि
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर साफ़ तौर पर उन्हें सरकार और प्रशासन द्वारा फंसाए जाने की बात कही जा रही है। पत्रकार रोहिणी सिंह का कहना है कि डॉ कफ़ील को इस मामले में सिर्फ उनके मुस्लिम नाम की वजह से फंसाया गया।
रोहिणी सिंह ने ट्विटर के ज़रिए कहा, “डॉ कफील कभी दोषी नहीं थे। यह पहले दिन से ही स्पष्ट था। उनका एकमात्र गुनाह उनका नाम था। ये कारण उन्हें मिले अपमानजनक उत्पीड़न के लिए काफ़ी था”।
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Dr Kafeel was never guilty. That was evident from the first day itself. His only crime was his name. That was reason enough for the outrageous levels of harassment meted out to him.
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10 अगस्त, 2017 की रात जब डॉ. कफील ड्यूटी पर थे, तब अचानक ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म होते ही आईसीयू विभाग में भर्ती कई नवजात बच्चों ने दम तोड़ दिया था। उस वक्त डॉ. कफील बच्चों को बचाने के लिए अस्पताल के बाहर से ऑक्सीजन सिलिंडर लाए थे। घटना के बाद शुरुआत में तो डॉ. कफील मीडिया में हीरो बनकर उभरे। लेकिन थोड़े ही दिन बाद जब उन्होंने सरकार की लापरवाही पर सवाल खड़े करना शुरु किया तो 22 अगस्त को उन्हें लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित कर दिया गया और उनके खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी गई।
इसके बाद 2 सितंबर 2017 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जिसके बाद उन्होंने कोर्ट से ज़मानत की अपील की और 9 महीने बाद 25 अप्रैल 2018 को कफील को ज़मानत मिल गई। ज़मानत के बाद कफील ने हाईकोर्ट का रुख़ किया, जहां मार्च 2019 में कोर्ट ने विभागीय जांच 90 दिनों में पूरा करने का आदेश दिया। अब दो साल बाद उन्हें मामले में निर्दोष पाया गया है।

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